रेलवे के जितने बड़े अधिकारी हैं यह मैसेज उन लोगों के लिए है।

रेलवे के जितने बड़े अधिकारी हैं यह मैसेज उन लोगों के लिए है।

आज से करीब ३ साल पहले रेलवे काउंटर पर लोगों की भीड़ लगी रहती थी। लोग आधी रात से लेकर सुबह ८:०० बजे तक का वक्त बिताते थे ताकि जब उनका नंबर आए तो उन्हें आसानी से तत्काल टिकट प्राप्त हो जाए, पर ऐसा नहीं होता था। भारत में जितने भी रेलवे काउंटर हैं उन सब में दलालों का राज हुआ करता था। उनके साथ ‘आर पी एफ” भी मिली रहती थी और बुकिंग क्लर्क भी मिले रहते थे।
बुकिंग क्लर्क प्रत्येक टिकट पर ₹५ से ₹१० लिया करते थे वहीं दूसरी ओर जो ‘आर पी एफ’ है वह महीने के ₹३००० से ₹५००० लिया करती थी एक-एक दलालों से।
जो व्यक्ति आधी रात ४:०० बजे से लेकर सुबह ८:०० बजे तक का इंतजार करके टिकट कटाने जाता तो बुकिंग क्लर्क और तलाल मिलकर उस को टिकट नहीं देते थे टिकट सिर्फ दलालों को ही मिलती थी अगर एक आम आदमी टिकट काट ले तो इनकी ऊपर की कमाई कैसे होती?

फिर समय बदला आईआरसीटीसी ने अपना सरवर को अपडेट किया और फिर ऑनलाइन टिकट बुक होनी चालू हो गई। जो लोग खुद से बुक कर सकते थे वह खुद ऑनलाइन टिकट बुक करते थे और जो ऑनलाइन बुक करना नहीं जानते थे वह लोग ट्रैवल एजेंट के पास आकर टिकट को बुक करवाते थे, ट्रैवल एजेंट भी उसे आराम से टिकट बुक कर के देदेता सिर्फ सो ₹५० लेकर, वहीं अगर वह आदमी रेलवे काउंटर पर जाकर दलाल से टिकट लेता तो उसे ₹२०० से ₹५०० देने पड़ते क्योंकि उस दलाल के पास उसका जवाब था कि भाई वह रात से खड़ा है मेहनत का पैसा तो लगेगा, और आरपीएफ और बुकिंग क्लर्क सब दलालों का ही साथ देते क्योंकि इन सब की कमाई बंधी थी उसमें।

जब आम आदमी या पैसेंजर को यह लगने लगा कि ट्रैवल एजेंट के पास जाकर टिकट कराना सस्ता पड़ता है तो उन्होंने ट्रैवल एजेंट को बुकिंग देना चालू कर दिया। अब रेलवे काउंटर में जितने भी दलाल थे ‘आर पी एफ’ थे और बुकिंग क्लर्क थे इन सब की ऊपरी कमाई बंद हो गई। ऐसा होता देख यह सब बोखला से गए और अपने ऊपर सीनियर्स को यह कहने लगे कि ट्रैवल एजेंट सॉफ्टवेयर से टिकट बुक करते हैं और यहां जो लोग लाइन लगाकर खड़े रहते हैं उनको टिकट नहीं मिला करती। इन्हें दरअसल लोगों से कोई मतलब ही नहीं रहा करता था इनका मतलब तो कुछ और ही था। अगर कोई आदमी आधी रात से सुबह तक खड़ा होकर एक या दो नंबर पर लाईन प्राप्तकर्ता तो यह दलाल उनसे झगड़ा करके उनको लाइन से बाहर निकाल देते और इस काम में ‘आर पी एफ’ भी इनकी पूरी मदद करती थी।

अगर इस मैसेज को रेलवे का कोई बड़ा अधिकारी पड़ रहा है, या रेल मंत्री पीयूष गोयल खुद पढ़ रहे हैं, या देश के प्रधानमंत्री मोदी जी पढ़ रहे हैं, तो आप सिर्फ इतना सोचो कि ट्रैवल एजेंट जो टिकट बुक करता है वह क्या अपने लिए करता है वह तो पैसेंजर के लिए ही करता है ना।
आज अगर किसी पैसेंजर को बिना लाइन लगाए रात भर ट्रैवल एजेंट से टिकट बनाना आसान होता है तो इसमें क्या बुराई है? जहां रेलवे दलाल एक टिकट के ₹२०० से ₹५०० लिया करते थे वहां ट्रैवल एजेंट तो सो ₹५० में ही टिकट दे देता है ना।

अगर अब भी आपको कोई संकोच है तो आप खुद सर्वे करवा सकते हैं १०० लोगो से पूछिए कि उनको टिकट बुक करने के लिए दलालों के पास जाना पसंद है या ट्रैवल एजेंट के पास जाना पसंद है? मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि ९९% लोग यही कहेंगे कि ट्रैवल एजेंट से टिकट बुक कराना उनके लिए सुविधाजनक है।

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